बचपन था कुछ ऐसा मेरा, कोई न था साथी
शर्मीला और गंभीर था कुछ मैं, संगति मुझको न भाती
रिश्ते नाते सब थे झूठे, मतलब की दुनिया थी सारी
मैं ही मेरा दोस्त था बस तब, खुद से की मैंने यारी
पर न जाने तुम कैसे आके, दोस्त बन गए ऐसे मेरे
दोस्ती का मतलब मुझको सिखाके, ज़िन्दगी के मिटा दिए अँधेरे
पर न जाने वो दिन कहाँ गए, अब तुमको मेरी फ़िक्र कहाँ है
ज़िन्दगी तुम्हारी है अब भी जारी, मेरा उसमे जिक्र कहाँ है?
पहले तो कहते थकते न थे, तुम जेसा दोस्त नहीं है कोई
अब जाने क्यों याद न आया, बदल गए तुम मैं तो हूँ वो ही
अभी भी जिंदा रखा है मेने, वो बचपन का दोस्त तुम्हारा
शायद कभी भूले भटके ही, मेरा दोस्त आजाये दोबारा
लेकिन शायद धोखे में मैं, खुद को ही रख रहा हूँ
तुम तो खुश हो अपने जीवन में, मैं ही दुःख सह रहा हूँ
लेकिन अब मैंने भी ठाना, जी लूँगा मैं भी बिन तेरे
आंसू गिरने न दूंगा फिर, ज़ख्म हो जाये कितने भी गहरे
और अब अगर ईश्वर भी मुझको, आजाये समझाने को
न करूँगा माफ़ तुझे मैं, कह दूंगा उसको जाने को
क्यूंकि तुमने ही कमजोर किया है, वरना मैं तो बच्चा था
चाहे कह लो पत्थर दिल ही, मै तन्हा ही अच्छा था